सेवा और दान में अन्तर

दान तीन प्रकार के होते हैं - १.सात्विक २.राजसिक ३.तामसिक । आप ने जैसा किया वैसा मिलेगा,और मिलेगा जरुर ।

इसलिए सोच समझकर ही दान करें । श्री मद्भगवद्गीता अध्याय 17 के श्लोक संख्या 20-21-22 का

भलीभांति चिंतन करने के बाद दान देना प्रारम्भ करे ।

सेवा वह वृत्ति है- जिससे स्वयं नारायण प्रसन्न होते हैं । सेवा का मतलब ही भगवान की आज्ञा मनाकर सच्चे ह्रदय से किया जाने वाला कार्य । जिसमें छल-प्रपंच-द्वेष-रागादि नहीं होते हैं । केवल एक भावना होती है हमारे प्रभु प्रसन्न होगें । अर्थात भगवान के सिवा और किसी को भी प्रसन्न नहीं करना ही सच्ची सेवा है । यह भी कह सकते हैं कि भक्त यह सोचता है कि भगवान प्रसन्न हुए तो सभी प्रसन्न हो जायेंगे । और यदि भगवान प्रसन्न नहीं हुए तो दुनिया को प्रसन्न करने का क्या मतलब ?

-स्वामी अमृतानन्द

नारी तू नारायणी

हमारे देश में पाप की सारी हदें पार हो चुकी हैं । लगता है कि इस देश में एक भी मनुष्य नहीं बचे हैं । और तो और हिन्दुओं ने अपनी मर्यादा की रक्षा करना छोड़ दिया है, और पाप में डूबे चुके हैं । हिन्दुओं के बच्चों को इंटरटेनमेंट को देखने को होड़ लगी हुई है लगता है हर व्यक्ति यह मान चूका है की हम आखिरी पड़ाव पर हैं चलो जल्दी से मजे ले लेते हैं । या फिर यह मान चूका है की कोई अवतार इन्हें बचा लेगा ।

अब मणिपुर और पुरे देश में अपनी बच्चियों को देखने से तो एसा ही प्रतीत होता है हम अपनी मर्यादा की रक्षा नहीं कर रहे । अतः हमारा सर्वनाश होने से महादेव भी नहीं रोक सकते । भगवान राम का रामबाण भी लौट जायेगा । भगवान श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र भी अब हमें नहीं बचाएगा । हमने हमारी धर्म की आत्मा की हत्या कर दी है । अब धर्म हमें क्यों बचाएगा । अब हम जीने के अधिकारी नहीं है, सभी हिन्दू-साधू-संत-महात्मा-हिन्दू-पाप में डूब नेताओं की चाटुकारिता में लगे हुए हैं । सभी ने यह मन लिया है, की नेताओं की चाटुकारी करो और मौज लो । केवल "पाप-पाप-पाप" भगवान मुझे क्षमा करें।

स्वामी अमृतानन्द

सुविचार

संसार का सबसे कीमती आभूषण

हमारा परिश्रम है । और

संसार में हमारा सबसे अच्छा साथी

हमारा आत्मविश्वास है ।

यदि आप चाहते हैं कि आप से भगवान प्रसन्न रहें

इश्वारे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च ।

प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ।।

यदि आप चाहते हैं की आप हमेंशा भगवान की कृपा में रहें तो आप को चार तरह के लोंगों से चार तरह का व्यवहार रखना चाहिए -

1 - आप का प्रेम भगवान से हो, २- भगवान के भक्त से मैत्री हो,

३- अज्ञ (अज्ञानी)पर कृपा करें, ४- द्वेष करने वाले की उपेक्षा करें ।

यह भगवदाज्ञा हमेशा स्मरण रखें ।